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बदलाव

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बदल रहा है मौसम, बदल रहा है नजारा,  बदल रहा है, जीवन का सार सारा,  बदल रही है मेरी कहानी, बदल रही है मेरी मनमानी।  बदलावो का आया ऐसा तूफान, बदल जायेगा मेरा संसार।  बदलावो कि यह ऐसी कहानी लगती सभी बेटियों को अपनी सी कहानी।  बदल दे आँगन बदल दे पुरा घरबार,  क्यु बनाया बेटी का ऐसा संसार?  बदल रहा है मौसम बदल रहा है नजारा,  न जाने क्या होगा आगे का नजारा,  आएगी खुशियाँ या ढूँढ लेगा दुःख हमारा गलियारा।  रह-रह के सवाल आता, घर से दुर जाने का खयाल भी हमे डराता।  मौसम ने की ऐसी मनमानी, बदलती सी लग रही है जीवन कि कहानी।  बेटी हो जाएगी बेगानी, ऐसी क्यु कि समाज ने अपनी मनमानी?                                                           (Khushboo soni) 

संगती

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घुमे मंदिर-मस्जिद और गुरुद्वारा, पुजा साधु-महात्मा का चरण द्वारा, मिला कुछ फिर ज्ञान का भंडारा, हल्का होने लगा अज्ञानता का अँधियारा। हो गई इतने में संगत ऐसी, भाए मन को पर कर दे दुर ज्ञान की ज्योति। मन तो है एक चंचल बालक, उसे भाए केवल सुख का आलम, वो न जाने ज्ञान का पालन। मन की पकड़ो सदा लगाम, सदा रखो कुसंगती का ध्यान। संगति ही हमें बनाती, ज्ञान की राह दिखाती। कृष्ण सी दोस्ती कराती, हर युद्ध में विजय दिलाती। कुसंगति विनाश जगाती, दानवीर की दुर्गती कराती।  

धनतेरस

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 धनतेरस आई है वातावरण में थोड़ी ख़ुशियाँ छाई है, साथ अपने एक नई उमंग भी लाई है, छोटी-बड़ी सब दुकानों में अब थोड़ी हलचल छाई है, उतरे थे चेहरे कई दिनों से, फिर से ग्राहकों की रोनक आई है। धनतेरस आई है वातावरण में थोड़ी ख़ुशियाँ छाई है, साथ अपने कुछ बंदिशों की मोहर भी साथ लाई है, अभी भी कोरोना की घटा छाई है। इसको नजर अंदाज न करना,खुशियों को बरबाद न करना, अपने और अपनो को बचाना है, बंदिशों का पालन करते हुए ही, खुशियों के साथ धनतेरस मनाना हैं।