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संगती

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घुमे मंदिर-मस्जिद और गुरुद्वारा, पुजा साधु-महात्मा का चरण द्वारा, मिला कुछ फिर ज्ञान का भंडारा, हल्का होने लगा अज्ञानता का अँधियारा। हो गई इतने में संगत ऐसी, भाए मन को पर कर दे दुर ज्ञान की ज्योति। मन तो है एक चंचल बालक, उसे भाए केवल सुख का आलम, वो न जाने ज्ञान का पालन। मन की पकड़ो सदा लगाम, सदा रखो कुसंगती का ध्यान। संगति ही हमें बनाती, ज्ञान की राह दिखाती। कृष्ण सी दोस्ती कराती, हर युद्ध में विजय दिलाती। कुसंगति विनाश जगाती, दानवीर की दुर्गती कराती।  

धनतेरस

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 धनतेरस आई है वातावरण में थोड़ी ख़ुशियाँ छाई है, साथ अपने एक नई उमंग भी लाई है, छोटी-बड़ी सब दुकानों में अब थोड़ी हलचल छाई है, उतरे थे चेहरे कई दिनों से, फिर से ग्राहकों की रोनक आई है। धनतेरस आई है वातावरण में थोड़ी ख़ुशियाँ छाई है, साथ अपने कुछ बंदिशों की मोहर भी साथ लाई है, अभी भी कोरोना की घटा छाई है। इसको नजर अंदाज न करना,खुशियों को बरबाद न करना, अपने और अपनो को बचाना है, बंदिशों का पालन करते हुए ही, खुशियों के साथ धनतेरस मनाना हैं।        

जिंदगी का खजाना

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 जिंदगी है रंग बिरंगे पलो की माला, कभी सुखों की लहर तो कभी मिलें दुःखो का खजाना। हर पल है एक अनमोल खजाना, दिखाता है जिन्दगी का हर बार रूप निराला। कभी सुखों की चादर से हमें चमकाए, कभी दुखों के झंकार से हमें मजबुत बनाए। जिंदगी है रंग बिरंगे पलो की माला, कभी सुखों की लहर तो कभी मिलें दुःखो का खजाना। जिन्दगी जीने का बस एक है अंदाज, जिलों हर पल को एक मुस्कुराहट के साथ। कल क्या हो ये किसने जाना हमें तो बस आज को है चमकना। जिंदगी है रंग बिरंगे पलो की माला, कभी सुखों की लहर तो कभी मिलें दुःखो का खजाना।

हमारा गाँव

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गाँव की वो गलियाँ, घर का वो चौबारा जिसमें गुजरा बच्चपन हमारा। दोस्तों के संग वो धुम मचाने का नजारा, कभी कंचे तो कभी गिली डंडा खेलता वो नजारा। गाँव की वो गलियाँ, घर का वो चौबारा जिसमें गुजरा बच्चपन हमारा। गाँव तो था सबको ही बड़ा प्यारा पर कभी सपनो ने तो कभी परेशानियों ने दिखा दिया शहरो का नजारा। आ तो गए कर के रुख शहरों का नजारा , रह गया कही न कही मन में वो गाँव की शान्ति का सुकुन प्यार।। गाँव की वो गलियाँ, घर का वो चौबारा जिसमें गुजरा बच्चपन हमारा। आना जीतना आसान था जाना अब उतना आसान भी नही, अब हम भी घुल गय है शहरो की माया जाल में कही, फिर भी रह- रह के आशाएँ यही जगाते है, जवानी न सही बुढापा तो गुजरे गाँव में यही सपने सजाते है। गाँव की वो गलियाँ, घर का वो चौबारा जिसमें गुजरा बच्चपन हमारा।

माया आम की।

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फलो का राजा होता हैं आम, लेकिन ये होता नही बिलकुल भी आम। छुपा रखा है इसने कई गुणों की खान, सुनाता हैं ये समाज के कई फरमान। खट्टे आम कुछ को ही भाते,  नए बदलाव कुछ को ही रास आते। धीरे-धीरे ये पक्कते जाते सबको ये स्वाद दिलाते, बदलावो की भी यही है बात, घुल जाते है सब मे समय के साथ। ज्यादा ही ये जब पक्क जाते किसी को भी ना रास आते, बदलावों में भी जो घुल ना पाते , समाज से अलग अपने को पाते। प्रकृति की तो यही है माया,  समय के साथ बदलती अपनी काया। जो इसमे बह पाया, वही तो आखिर तक है रह पाया।

Math ke saval

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ओ math के सवाल, क्यों करता है इतना हमें परेशान, दसवीं तक तो हम करते थे तुम से प्यार,  अब तुझमे speed बनाने के चक्कर में हो गए हम परेशान। हर competition exam में तु ही हमेशा भारी है, इसमे क्या गलती हमारी है?? दसवीं से हजार गुणा तुझे घुमाया है, फिर भी सब कहते है दसवीं तक का ही तो pattern आया हैं। ओ math के सवाल क्यों करता है इतना हमें परेशान।

Dharti Mata

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धरती माँ थी परेशान बड़ी, हुए इस पर हत्याचार कई |  सुख का तो नामो निशान नहीं,पर मशीनों के हुवे अविष्कार कई |  हर तरफ आविष्कारों की घटा छाई है , जाने अनजाने विनाश कारक हथियारो की लाइन लगाई है |  धरती माँ थी परेशान बड़ी, धुँए का कोहराम यही,  शांति का तो नामो निशान नहीं | गुम गई चिड़ियों की चहचाट कही, रह गई बस गाड़ियों की आवाज यहीं | गंगा माँ को भी दुःख छाया था, उन्हें भी लोगो ने मेला बताया था |  कही पे सुखा तो कही बाढ का आंतक छाया था, हमने अपने ही कर्मो का फल पाया था |  फिर माँ ने अपना प्रकोप दिखाया था, केदारनाथ जैसा हा हा कार मचाया था |  फिर भी माँ के दुःख को न जाना, ना माँ के प्रकोप को पहचाना |  अब बड़ा संकट का समय आया है, माँ ने अपना प्रचंड़ रूप दिखाया है |  सब को अपने घरों में बैठाया है, खुद को स्वच्छ करने का जिम्मा खुद ने उठाया है | रोक दिए आविष्कार सभी, शोर का भी नामो निशान नहीं | गंगा भी अब स्वच्छ कहलाई, वातावरण में भी थोड़ी ठण्ड छाई | अब तो मा...